ग्वार उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक
ग्वार का शाब्दिक अर्थ गऊ आहार होता है अथार्त प्राचीन काल में इस फसल की उपयोगिता चारा मात्र् में ही थी, परन्तु वर्तमान में बदली परिस्थितियों में यह एक अतिमहत्वपूर्ण औद्योगिक फसल बन गई है । ग्वार के दानों से निकलने वाले गोंद के कारण इसकी खेती बीजोत्पादन के लिए करना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। ग्वार राजस्थान के पश्चिम प्रदेश की अतिमहत्वपूर्ण फसल है। अतः किसान भाइयों को उन्नत कृषि तकनीक से ग्वार उत्पादन करना चाहिये ताकि उन्हें फसल से अधिक से अधिक लाभ मिल सके।
उन्नत कृषि तकनीक
खेत की तैयारी : ग्वार की फसल लगभग सभी तरह की भूमि में ली जा सकती है परन्तु क्षारीय तथा जिस भूमि पर पानी ठहरता हो इसके लिए उपयुक्त नहीं है। मई माह में खेत को एक - दो गहरी जुताई कर छोङ देना चाहिये । मानसून की प्रथम वर्षा के साथ एक दो जुताई कर पाटा लगाकर खेत तैयार करना चाहिये । मानसून पूर्व खेत में गोबर की खाद चार पॉच ट्रोली प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह बिछा लें। बुवाई से पूर्व खेत खरपतवार रहित तथा पर्याप्त नमीयुक्त होना चाहिये l
उन्नत किस्में :
ग्वार की उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं :
आर.जी.सी. 936 : यह शाखित व जल्दी पकने वाली किस्म है l यह असिंचित (बारानी) क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म है l
आर.जी.सी. 986 : यह अशाखित व मध्यम पकने वाली किस्म है जो सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयोगी है l
आर.जी.सी. 1002 : यह शाखित व जल्दी पकने वाली किस्म है l यह असिंचित व सिंचित दोनों परिस्तिथियों के लिए उपयुक्त किस्म है l
आर.जी.सी. 1003 : यह शाखित व जल्दी पकने वाली किस्म है जो असिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।
आर.जी.सी. 1066 : इस किस्म के पौधे शाखाओं रहित होते है । पौधे की ऊँचाई 60 - 90 सेमी. होती है । इस किस्म में फलियाँ जमीन से 2-3 सेमी. ऊपर से ही लगने लग जाती है । यह एक जल्दी पकने वाली (85 -90 दिन) किस्म है । यह किस्म खरीफ व जायद दोनों ही परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है l
एच.जी. 365 : यह शाखित व जल्दी पकने वाली किस्म है जो हरियाणा व राजस्थान के लिए उपयुक्त है l
एच.जी. 563 : यह शाखित एवं जल्दी पकने वाली किस्म है जो की ग्वार उगाने वाले सभी क्षेत्रोँ के लिए उपयुक्त हैl
एच.जी. 2-20 : यह शाखित एवं जल्दी पकने वाली किस्म है जो असिंचित व सिंचित दोनों परिस्तिथियों के लिए उपयुक्त है l इसकी खेती जायद ऋतु में भी की जा सकती हैl
आर.जी.सी. 1031 : इस किस्म के पौधे भी अधिक लम्बाई वाले (74 - 108 सेमी.) व अधिक शाखाओं वाले होते है । यह देर से पकने वाली (110 - 114 दिन) किस्म है l
आर.जी.सी. 1017 : इस किस्म के पौधे छोटे (55-60 सेमी.) व अधिक शाखाओं वाले होते हैं । पौधे की पत्तियां किनारों पर अधिक कटी होती है ।यह किस्म 90 -100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है ।
आर.जी.सी. 1038 : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई 60-75 सेमी. व शाखाओं युक्त होती है । यह किस्म 95 - 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है व खरीफ व जायद दोनों ही परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है l
आर.जी.सी. 197 : यह बिना शाखाओं वाली किस्म है । इसके पौधे की लम्बाई 90 से 120 सेमी. होती है । यह किस्म 100 से 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है ।
आर.जी.एम. 112 : यह किस्म बैक्टीरियल ब्लाइट व जड़ गलन रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है तथा लगभग 95 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है l
बुवाई : जुलाई का प्रथम पखवाङा (1 से 15 जुलाई) ग्वार की बुवाई के लिये सही होता है जबकी जल्दी पकने वाली किस्मों के लिये 20 से 30 जून सही समय होता है। 20 जून से पहले बुवाई करने पर पौधे की कायिक बढ़वार तो खूब होती है परन्तु उसमें फलियाँ कम लगती हैं जिससे बीज की उपज कम हो जाती है । 25 जुलाई के बाद बुवाई करने से भी बीज की उपज कम होती है। अतः ग्वार की बिजाई का उपयुक्त समय 01 से 15 जुलाई तक है।
बीजोपचार : ग्वार की जङों में जो मूलग्रंथियां होती है वे पर्यावरण की नत्र्जन के स्थरीकरण का कार्य-करती है, अथार्त जमीन को नत्र्जन की आपूर्ति करती हैं। इन जड़ ग्रंथियों के अच्छे विकास के लिए बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए । इसके लिए 100 ग्राम गुड़ को 1 लीटर पानी में घोल लेवें। घोल ठण्डा होने पर इसमें 600 ग्राम राइजोबियम कल्चर अच्छी तरह से मिला लेवें। इस घोल में 10 किलोग्राम बीज को अच्छी तरह से उपचारित करें ताकि सभी बीजों पर कल्चर की परत चढ जाये। अब बीजों को निकालकर छाया में सुखाकर शीघ्र ही बुवाई कर देवें। फसल को रोग मुक्त रखने हेतु बीज को ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से भी उपचारित करना चाहिये l
बीज दर : ग्वार की अकेली फसल हेतु 12 से 15 किलो उन्नत किस्म का बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करें। ग्वार की बुवाई कतार या पंक्ति में करें। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 से.मी. रखें तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 से.मी. रखें।
उर्वरक प्रबंधन : दलहनी फसल होने के कारण ग्वार को नत्र्जन की विशेष आवश्यकता नहीं होती है। फास्फोरस की 40 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर मात्रा, ग्वार के लिये लाभदायक होती है जो की बुवाई के साथ ही दे देनी चाहिये । फास्फोरस की आपूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट से करने से पौधों को गंधक की आपूर्ति भी हो जाती है। बुवाई से लगभग 15 दिन पूर्व गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद 10 से 15 टन प्रति हैक्टर की दर से खेत में मिलानी चाहिये l खेत में गोबर की खाद मिलाने से मृदा की जल ग्रहण क्षमता बढ़ती है एवं पौधों को बढ़वार के लिये पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं l ग्वार दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में जड़ ग्रंथियां पाई जाती हैं, जो वातावरण से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है और मृदा की भौतिक दशा को सुधारने के साथ-साथ अन्य फसलों की उपज में वृद्धि करती है l
जल प्रबंधन : आमतौर पर ग्वार की खेती वर्षा आधारित शुष्क व अर्ध शुष्क क्षेत्रों में की जाती है l लेकिन यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो फसल को पानी की कमी होने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिये l मुख्यतः फूल आने पर एवं बीज बनने की अवस्था पर जीवन रक्षक सिंचाई अवश्य करनी चाहिये l बीज बनने के समय ज्यादा तापमान एवं निम्न आर्द्रता होने से फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है l वर्षा आधारित क्षेत्रों में खेतों की मेढ़ बंदी कर वर्षा जल का संरक्षण किया जाना चाहिये l बुवाई के 25 व 45 दिन बाद थायोयूरिया के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से फसल में जल कि कमी को सहने की क्षमता बढ़ती है l
निराई गुड़ाई : बुवाई के 25 से 30 दिन बाद पहली निराई गुड़ाई करनी चाहिये । दूसरी निराई गुड़ाई यदि आवश्यकता हो तो 40 से 45 दिन पश्चात करनी चाहिये। समय पर निराई गुड़ाई करने से खरपतवार तो समाप्त होती ही है साथ ही भूमि में हवा का प्रवाह भी अच्छा होता हैं।
पौध व्याधि एवं कीट प्रबन्धन : ग्वार की फसल अन्य फसलों की तुलना में व्याधियों एवं कीटों के प्रकोप में कम आती है। फिर भी कुछ बिमारियाँ एवं कीट अनुकूल मौसम होने पर इसे प्रभावित करते हैं । ग्वार की प्रमुख बिमारियाँ जीवाणु पर्ण अंगमारी, अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, जङ गलन व चूर्णिल आसिता हैं जो की फसल को आर्थिक रूप से हानि पहुँचाती हैं। जीवाणु पर्ण अंगमारी खेत में फैलने पर फसल को 50-60 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचा सकती हैं। बिमारियों के प्रकोप से बचने हेतु निम्न बचाव करने चाहिये
1। रोग प्रतिरोधी किस्म का प्रयोग करना चाहिए ।
2। उचित फसल चक्र अपनाना चाहिये ।
3। समय समय पर खरपतवार निकालना ।
4। मई माह में खेत की गहरी जुताई कर छोङ देना चाहिये।
खङी फसल मे बीमारी का प्रकोप होने की स्थिति में निम्न उपचार करने चाहिये।
1। पौधे के रोगग्रस्त भागों को तोड़ कर जला देना चाहिये।
2। ज्यादा संक्रमित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिये।
ऐसे खेत जहाँ कीट बिमारियों की संभावना ज्यादा रहती है उनमें बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय नीम की खल (नीम केक) को अच्छी तरह कूट पीस कर खेत में मिलाने से खेत में कीटों व बिमारियों के बीजाणु नष्ट हो जाते हैं।
ग्वार में कीटों का प्रकोप भी कम होता हैं, परन्तु तैलिया (जैसिड) कभी कभी कुछ स्थानों पर फसल को नुकसान करता है। इसके बचाव के लिये ग्वार की जल्दी पकने वाली किस्में उपयुक्त रहती हैं साथ ही ज्यादा प्रकोप की स्थिति में किसी भी नीम आधारित कीटनाशक (निम्बीसिडिन) से उपचार करना चाहिये।
रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ग्वार की फसल में नहीं करने से हमारे उत्पाद (ग्वार गम ) की गुणवत्ता अच्छी होती है l चूँकि ग्वार की फसल मुख्य रूप से बीज के लिये उगाई जाती है जिससे ग्वार गम बनता है जो कि विदेशों में निर्यात किया जाता है। ग्वार गम का प्रमुख उपयोग खाद्य पदार्थों में होता है। खाद्य पदार्थों में रासायनिक कीटनाशकों के अवशेष रह जाने पर मानव शरीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं l अतः ग्वार की फसल में एंव कटाई पश्चात रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग जहाँ तक सम्भव हो सके नहीं करना चाहिये ताकि हमारा उत्पाद आन्तरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाला हो सके।
कटाई व गहाई : जल्दी पकने वाली किस्में लगभग 90 दिन में पक जाती हैं जबकि अन्य किस्में 110 से 125 दिन में पक जाती हैं । सामान्यतः जब पौधे की पत्तियाँ सूखकर गिरने लगे तथा फलियाँ भी सूखकर भूरे रंग की होने लगे, तब फसल की कटाई कर देनी चाहिये। गहाई (थ्रेशिंग) के लिये फसल को धूप में अच्छी तरह सुखा लेना चाहिये एवं उसके बाद श्रमिकों या थ्रेशर मशीन से थ्रेशिंग कर लेनी चाहिये।
इस तरह उन्नत कृषि तकनीक अपनाकर ग्वार की फसल से अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकता है।
वहनीय कृषि (टिकाऊ खेती)
पृथ्वी पर मानवता के इतिहास के साथ ही कृषि का भी उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकास हुआ है। फसलों की उत्पादकता में नवीन प्रौद्योगिकी, अधिक उपज वाली किस्में, खेती के उपकरण, उर्वरक एवं कीटनाशी रसायनों के उपयोग से वृद्धि हुई है तथा विशिष्ट शस्यक्रियाओं एवं जल प्रबन्धन तथा नवीन सिंचाई पद्धतियों ने भी उत्पादकता अभिवृद्धि में योगदान दिया है। आधुनिक तकनीक ने जहाँ एक ओर उत्पादकता में वृद्धि की है वहीं इसके पर्यावरण और सामाजिक जीवन पर दुष्प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए हैं। पर्यावरण संतुलन और मानव स्वास्थ्य पर होने वाले विपरित प्रभाव के मद्देनजर यह अनुभव किया जा रहा है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी के उद्देश्यों की प्राप्ति हरित प्रौद्योगिकी अथवा टिकाऊ खेती के दृष्टिकोण के माध्यम से होनी चाहिए। टिकाऊ खेती ही वह एक मात्र तरीका है जो आर्थिक उन्नति के मध्य संतुलन स्थापित कर सकता है। अतः यह आज के समय की मांग है। आगामी परिच्छेदों में टिकाऊ खेती के उद्देश्यों का संक्षिप्त वर्णन करने का प्रयास किया गया है।
टिकाऊ खेती क्या है ?
रसायनिक कीटनाशी एवं उर्वरक रसायनों पर आधारित आधुनिक खेती ने कृषि उत्पादन को कई गुना बढ़ाया है लेकिन साथ ही पर्यावरण संसाधन एवं शस्य विभिन्नता को हानि पहुँचाई है। अतः यह अनुभव किया गया है कि यह आधुनिक कृषि तकनीक लम्बे समय तक उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने में सक्षम नही है। इस परिपेक्ष में वहनीय या टिकाऊ खेती एक ऐसी अवधारणा है जो उत्पादकता वृद्धि के साथ पर्यावरण, संसाधन संरक्षा एवं गुणवता भी रेखांकित करती है। प्रायः टिकाऊ खेती और जैविक कृषि को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है, लेकिन वस्तुतः यह दोनों अलग हैं।
जैविक खेती में किसी भी प्रकार के रसायनों का उपयोग प्रतिबंधित होता है। लेकिन टिकाऊ खेती में रसायनों का सीमित और संतुलित उपयोग किया जा सकता है जहॉ तक पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव न हो। अतः टिकाऊ खेती एक व्यापक विचार है जिसमें जैविक खेती, बायोडायनेमिक एवं न्यूननिवेश खेती इत्यादि भी समाहित होते हैं एवं मुख्य रूप से फसल आवर्तन, हरी खाद, जैव अपशिष्ट, शस्यक्रियाओं एवं खनिज लवणों के उपयोग पर आधारित होती है। साथ ही नाशी कीटों, खरपतवार एवं बिमारियों के जैविक और पर्यावरण मित्र तरीकों का उपयोग किया जाता है। संक्षेप में टिकाऊ खेती एक ऐसा छत्र है जिसके नीचे कई प्रकार की वैकल्पिक कृषि पद्धतियाँ प्रश्रय लेती हैं। टिकाऊ खेती एक दूरगामी सोच है न कि किन्हीं विशिष्ट कृषि पद्धतियों का समूह है। अतः टिकाऊ खेती कृषि उत्पादन और वितरण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसके निम्नांकित महत्वपूर्ण घटक है।
जैविक चक्रों और नियंत्रण का एकीकरण एवं समन्वय
मृदा स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण
अचक्रीय एवं बाह्य संसाधनों के उपयोग में कमी
कृषि आदानों का अनुकूल प्रबन्धन
पर्याप्त एवं सुरक्षित आय
पारिवारिक एवं सामुदायिक कृषि के अधिक अवसर
स्वास्थ्य, जैव विविधता, पर्यावरण सुरक्षा एवं जल गुणवत्ता पर न्यूनतम हानिकारक प्रभाव
वहनीयता (टिकाऊपन) के तत्व
किसी भी कृषि प्रणाली की वहनीयता में सुधार के अनेक तरीके होते है जो क्षैत्रीय कारकों पर निर्भर करते हैं । फिर भी कुछ सामान्य पद्धतियाँ या सिद्धांत हैं जो वहनीयता के लिए किसान वर्ग में समान रूप से ग्राह्य होते हैं।
जैसेः क्षैत्रीय संसाधनो का उपयोग जो दूरगामी लाभकारी हो, पर्यावरण हितकारी हो और ग्रामीण जीवन के लिए गुणकारी हो। उदाहरणार्थः
मृदा संरक्षणः इसके कई उपाय है जैसे मृदा समोच्च आकृति, समोच्च परिरेखण, श्रेणीबद्ध मेढ़, वानस्पतिक मेढ़, पट्टी फसल, आच्छादित फसल, न्यूनतम जुताई जिससे मृदा का वायु और जल के कारण न्यूनतम हास हो।
फसल वैविध्यः अलग अलग प्रकार की फसलो को बोने से अनिश्चित मौसम, बाजार और नाशी कीट और बिमारियों के प्रकोप से बचाव होता है। अन्य वनस्पति जैसे वृक्ष इत्यादि लगाने से भी लाभ होता है।
पोषण प्रबन्धनः नाइट्रोजन एवं अन्य पोषक तत्वों के प्रबन्धन से मृदा और पर्यावरण की सुरक्षा होती है। प्राकृतिक खाद के अधिक उपयोग से तथा फलीदार दलहनी फसलों द्वारा उर्वरक की लागत में कमी होती है।
समेकित (एकीकृत) नाशीकीट प्रबन्धनः यह टिकाऊ खेती का एक महत्वपूर्ण घटक है। जिसमें रसायनों के न्यूनतम प्रयोग के साथ जैविक, शस्यक्रियाओं एवं भौतिक उपाय उपयोग में लाते है। आच्छादित फसलें, फलीदार पौधे एवं सब्जी उगाने से भी खरपतवार नियंत्रण, मृदा रक्षण, पोषक तत्व में वृद्धि एवं गुणवत्ता में सुधार होता है।
चक्रीय चराईः सघन चराई प्रबन्धन व्यवस्था में पशु चारागाहों में लाये जाते है। जिससे उन्हे पोषक चारा प्राप्त होता है और पशु आहार की कीमत में कमी आती है।
जल एकत्रीकरण और संरक्षण कृषि में अति महत्वपूर्ण है। जल प्रबन्धन की कई पारम्परिक और आधुनिक प्रणालियॉ उपलब्ध हैं जैसे गहरी जुताई, फलवार, स्प्रिंकलर, ड्रिप सिंचाई इत्यादि।
शस्यवानिकीः वृक्ष एवं अन्य वानिकी वनस्पति जो इतने उपयोग में नहीं है द्वारा मृदा और जल का संरक्षण।
विपणनः किसान वर्ग को विपणन के नये तरीके मालूम हो रहे हैं, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो रही है। किसान वर्ग समृद्ध होगा तो टिकाऊ खेती का मार्ग प्रशस्त होगा।
जैविक खेती की प्रक्रिया
जैविक खेती, देशी खेती का उन्नत तरीका है l इसमें रासायनिक खाद, कीटनाशकों आदि का उपयोग नहीं करके खेत में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष, फसल चक्र एवं प्रकृति में उपलब्ध खनिज द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं l फसल को प्रकृति में उपलब्ध मित्र कीट, जीवाणुओं एवं जैविक कीटनाशकों द्वारा हानिकारक कीड़ों एवं बीमारियों से बचाया जाता है l
जैविक खेती के लाभ :
- भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।
- रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर निर्भरता नहीं होने से लागत में कमी आती है।
- फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है ।
- जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
- भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है ।
- भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होता है ।
- फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि होती है l
- मानव स्वस्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है l
जैविक खेती का प्रमाणीकरण : जो किसान अपनी खेती की लागत में कमी लाना चाहते हैं उन्हें शीघ्रताशीघ्र जैविक खेती अपना लेनी चाहिए । इस पद्धति की सबसे अहम शर्त है कि बाहरी आदान के स्थान पर अपने द्वारा तैयार आदान उपयोग में लाए जावे । जैविक खेती बिना प्रमाणीकरण के सफल नहीं मानी जा सकती । जैविक उत्पाद की सत्यता जैविक उत्पादन प्रक्रिया की प्रमाणिकता से सत्यापित होती है और यह होने पर ही उपभोक्ता संतुष्ट होगा व उसका अतिरिक्त मूल्य भी देने को तैयार होगा l इसलिए किसी स्वतंत्र एजेन्सी से जैविक उत्पादन प्रक्रिया का प्रमाणीकरण आवश्यक है । अधिकतर देशों में कृषि उत्पादन विधि के प्रमाणीकरण को ही वरीयता दी जा रही है । इसे प्रक्रिया प्रमाणीकरण कहा जा सकता है । उपज के बाद किए जाने वाले प्रमाणीकरण को उत्पाद प्रमाणीकरण कहा जा सकता है । फसल उत्पादन के पश्चात् उसके रसायनिक विश्लेषण के आधार पर जैविक खेती का पूर्ण रूप से शुद्ध प्रमाणीकरण किया जाना संभव नहीं है । एक बात और भी स्पष्ट रूप से ध्यान रखने की है कि जैविक प्रमाणीकरण के लिए बनाए गए नियमों को अपनाने के बाद किसान अपनी इच्छानुसार इसे रसायनिक पद्धति में नहीं बदल सकेंगे । किसान का एक बार लिया गया निर्णय उसे जैविक किसान बना देगा । जैविक खेती प्रारम्भ करने के इच्छुक किसान को प्रमापीकरण के लिए निम्न प्रक्रियाये अपनानी होगी ।
जैविक खेती पंजीयन : जैविक खेती प्रारम्भ करने से पूर्व किसान को पंजीयन करने वाली संस्था के पास पंजीयन कराना आवश्यक है । वर्तमान में जैविक प्रमाणीकरण के लिए एकल एवं सामूहिक दोनों प्रकार से पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है ।
फार्म यूनिट की आधारभूत संरचना :- पंजीयन के पश्चात् किसानों को अपने फार्म यूनिट की आधारभूत संरचना संकलित कर प्रमाणीकरण एजेन्सी को निर्धारित प्रपत्र में भेजनी होगी ।
घोषणा और अनुबंध :- प्रमाणीकरण इन्सपेक्टर द्वारा निरीक्षण भ्रमण के दौरान भविष्य में अपनाई जाने वाली खेती की पद्धति तथा फार्म स्तर पर की जाने वाली सभी गतिविधियों की विस्तृत रूपरेखा किसान के साथ विचार-विमर्श कर बनाई जाती है । इसमें फसल उत्पादन के साथ अन्य सभी कार्यों की वर्तमान स्थिति, पहले से अपनायी जा रही कृषि क्रियाओं एवं अब जैविक खेती के नियमों के अन्तर्गत किए जाने वाले परिवर्तनों का विवरण अंकित किया जाता है । जिस पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होते हैं । अग्रिम कार्यवाही का यह मुख्य आधार है ।
जैविक उत्पादन योजना :- किसान द्वारा प्रमाणीकरण एजेन्सी के निरीक्षक द्वारा निरीक्षण एवं पूर्व अंकेक्षण के लिए किए गए भ्रमण के समय पूरी चर्चा की जाती है । उत्पादन योजना तय किए गए फसल चक्र के अनुसार तथा प्रत्येक मौसम में ली जाने वाली फसलों के लिए बनाई जाती है । उत्पादन योजना किसान स्वयं अपने स्तर पर बनाकर भी प्रमाणीकरण एजेन्सी को भेज सकता है । ध्यान रखने की बात यह है कि पैंरेलल या स्पलिट उत्पादन की स्थितिमें किसी एक समान फसल को जैविक तथा रासायनिक तरीके से पैदा करने की अनुमति नहीं है और यदि ऐसा किया जाता है तो जैविक पंजीयन निरस्त कर दिया जाता है ।
सपोर्ट मोनिटरिंग :- निगरानी के लिए नियमित अंकेक्षण और आकस्मिक निरीक्षण किया जाता है । इसके लिए प्रमाणीकरण एजेन्सी के मनोनीत निरीक्षक समय-समय पर खेत का दौरा करते हैं तथा इस दौरान वे वहां किए जा रहे कार्यों एवं गतिविधियों को प्रमाणित करते है । नियमित अंकेक्षण निर्धारित समय पर किया जाता है जबकि आकस्मिक निरीक्षण किसान को बिना सूचना किए किया जाता है ।
कटाई एवं प्रसंस्करण :- किसान को चाहिए कि वे अपने खेत में गुणवता के आधार पर फसल की कटाई करें और उनका अलग-अलग प्रसंस्करण करे ।
स्टॉक रजिस्टर :- जैविक खेती के अन्तर्गत किसान को अपनी उपज से सम्बन्धित सभी प्रकार के स्टॉक, उसका विवरण एवं उसके निस्तारण से सम्बनिधत सूचना रखनी होगी । यह रजिस्टर प्रमाणीकरण नियमों के अन्तर्गत बनाया जाता है तथा प्रमाणीकरण एजेन्सी के निरीक्षक अपने दौरे के समय इस रजिस्टर को प्रमाणित करते है ।
जैविक प्रमाण पत्र :- प्रमाणीकरण एजेन्सी स्टॉक रजिस्टर में रिकार्ड के अनुसार फसल एवं मात्रा के आधार पर जैविक प्रमाण पत्र जारी करती है । प्रमाण पत्र में किसान का नाम, उसकी पंजीयन संख्या, फसल का नाम, उपज की मात्रा एवं गुणवत्ता का विवरण होता है ।
खेती में प्रयोग हेतु पर्यावरण सुरक्षित जैविक संसाधन
जैव उर्वरक (बायो फर्टीलाइजर्स):
जैव उर्वरक ऐसे प्राकृतिक जीवाणुओं का समूह है, जिसको लिग्नाइट धारक के माध्यम से वैज्ञानिक विधियों से तैयार कर पोलिथिन की थैलियों में पैक कर किसानों को बीजोपचार, जड़ोपचार, भूमिपचार हेतु उपलब्ध करवाया जाता है । ये जीवाणु वायु मण्डल व भूमि में विद्यमान निष्क्रिय तथा अघुलनशील तत्वों को उपयोग कराते हैं । ये सस्ते व हानि रहित होते हैं । इनसे बीचोपचार करने से पौधों की जड़ों व आसपास की भूमि में जीवाणुओं की संख्या प्रचुर मात्रा में बढ़ जाती है ।
जीवाणु खाद में इन लाभदायक जीवाणुओं की संख्या एक ग्राम में दस करोड़ से अधिक रखी जाती है । ये जीवाणु सामान्यतः तीन प्रकार के होते हैं ।
राइजोबियम :- यह जीवाणु समस्त दलहनी फसलों में काम में लिया जाता है । इसमें राइजोबियम लेगुमिनोसेरम जीवाणु पाये जाते हैं । ये जीवाणु पौधों की जड़ों में ग्रन्थियां बनाकर रहते हैं तथा प्रत्येक ग्रन्थि में इन जीवाणुओं की संख्या लाखों में होती है । ये जीवाणु वायुमण्डल में उपस्थित स्वतन्त्र नत्रजन को ग्रहण कर उसे नाइट्रोजन यौगिकों (नाइट्रेट्स) में बदल देते हैं, जिसका उपयोग पौधें एवं जीवाणु दोनों करते हैं । बदले में जीवाणु पौधों से कार्बोहाइड्रेट्स प्राप्त करते हैं व अपना विकास करते हैं । अलग-अलग दलहनी फसलों के लिए अलग-अलग राइजोबियम कल्चर काम में लिया जाता है अर्थात् यह कल्चर फसल विशेष हेतु अलग- अलग होता है ।
एजेटोबेक्टर - यह जीवाणु समस्त बिना दाल वाली फसलों के लिए काम में लिया जाता है । इसके जीवाणु बीज पर लगाये गए कल्चर के माध्यम से मृदा में जाकर अपनी कॉलोनी बना लेते हैं एवं मुक्त रूप से मृदा व जड़ों के आस-पास रहते हैं । ये जीवाणु वातावरण की नत्रजन को ग्रहण कर स्वयं के लिए प्रोटीन का निर्माण करते हैं । यह प्रोटीन कुछ समय बाद मिट्टी में स्त्रावित करते हैं, जिससे पोधों की उपयोग योग्य नत्रजन की मात्रा में वृद्धि होती है । ये जीवाणु वृद्धि नियन्त्रक रसायन भी स्त्रावित करते हैं, जिससे बीजों की अंकुरण क्षमता व जड़ों के फैलाव में वृद्धि होती है ।
फास्फेट विलायक जीवाणु (पी एस बी) - फसलों को फॉस्फोरस मुख्यतः डी.ए.पी. एवं सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में दिया जाता है । दी गई फॉस्फोरस का बहुत बड़ा भाग जमीन में अघुलनशील अवस्था में रह जाता है । जिसे पौधे ग्रहण नहीं कर पाते हैं । पी.एस.बी. कल्चर में उपस्थित जीवाणु इस अघुलनशील फॉस्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधों को फॉस्फोरस उपलबध करवाते हैं । यह जीवाणु खाद सभी फसलों में काम आती है । इस जीवाणु खाद के उपयोग से विभिन्न फसलों में दी जाने वाली फॉस्फोरस की मात्रा में कमी की जा सकती है ।
जैव उर्वरक (बायो फर्टीलाइजर्स) उपयोग के लाभ
ऽ फसलों की उत्पादकता में टिकाऊपन ।
ऽ मृदा स्वास्थ्य में सुधार ।
ऽ मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार ।
ऽ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी ।
ऽ प्रति इकाई लागत में अधिक पोषक तत्वों की पूर्ति ।
ऽ पर्यावरण के लिए सुरक्षित ।
ऽ जैविक खेती का आवश्यक अंग ।
जीवाणु खाद के उपयोग की विधि :- जीवाणु खाद का प्रयोग आसान है । बीजों को बोने से पूर्व इसे खाद से उपचारित करना पड़ता है । बीजों को उपचारित करने के लिये एक लीटर या आवश्यकतानुसार पानी में 100 ग्राम गुड़ का घोल बना लेना चाहिये तथा इस घोल में कल्चर मिलाकर बीजों के ऊपर छिड़कते हुए हल्के हल्के हाथ से मिला देना चाहिये जिससे कि बीजों पर एक बारीक परत जीवाणु खाद की जम जाये । ऐसे उपचारित बीजों को छायादार स्थान पर सुखाकर शीघ्र बोना चाहिये । बीजों को फफूंदनाशक या कीटनाशक दवा से उपचारित करना हो तो पहले फंफूदनाशक फिर कीटनाशक दवा से उपचारित करना चाहिये एवं अन्त में जीवाणु खाद से उपचारित करना चाहिये ।
जीवाणु खाद की अन्य विशेषताएं :-
(1) जीवाणु खाद हानिकारक या विषैला नहीं है l
(2) जीवाणु खाद की कार्य क्षमता उसकी कीमत से कई गुना अधिक है l
(3) जीवाणु खाद से बीजों या पौधों की जड़ों को उपचारित करना बहुत आसान है l
(4) जीवाणु खाद के पैकेट्स को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान है ।
सावधानियाँ :-
(1) पैकेट पर लिखी फसल के लिये ही उसका प्रयोग करें l
(2) पैकेट पर लिखी अन्तिम तारीख से पूर्व प्रयोग करें l
(3) कल्चर का भण्डारण ठण्डे स्थान पर करें l
(4) कल्चर को धूप से बचाकर रखें l
(5) पैकेट पर लिखे निर्देशों का पालन करें l
(6) कल्चर को रासायनिक खादों व दवाओं के साथ न मिलायें l
(7) पारायुक्त रसायनों से उपचारित बीजों के लिए कल्चर की दुगनी मात्रा का उपयोग करें l
(8) यदि कवकनाशी तथा कीटनाशी दोनों दवाओं से बीजोपचार किया जाना हो तो सर्वप्रथम कवकनाशी फिर कीटनाशी से तथा अन्त में जीवाणु खाद से बीजोपचार करे एवं इसके क्रम में परिवर्तन नहीं करें l
ट्राईकोडर्मा (मित्र फफूंद):
फसल में लगने वाले जड़ गलन, उखटा, एवं तना गलन आदि भूमि जनित फफूंद रोगों की रोकथाम के लिये ट्राईकोडर्मा नामक जैविक दवा उपयोगी है l इससे बीज, जड़ व मृदा का उपचार करने से फसल की जड़ों के आस पास यह मित्र फफूंद की भारी संख्या में निर्मित हो जाता है l ट्राईकोडर्मा मृदा में स्थित रोग उत्पन्न करने वाली हानिकारक फफूंद की वृद्धि रोककर उन्हें धीरे धीरे नष्ट कर देती है जिससे रोग में कमी आती है l
उपयोग विधि
उपचारित किये जाने वाले बीज को किसी साफ बर्तन में रखें तथा बीज को हल्का सा गीला करेंl अब बीज़ों में 4 से 6 ग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर प्रति किलो बीज की दर से मिला कर अच्छी तरह से उलट पलट देवें ताकि पाउडर की एक समान परत बीजों के चारों ओर चिपक जावे l इसके पश्चात बीज की बुवाई कर देवें l बुवाई पूर्व अंतिम जुताई से पूर्व एक एकड़ भूमि को उपचारित करने के लिये एक किलो ट्राईकोडर्मा पाउडर 25 किलो कम्पोस्ट अथवा गोबर की खाद में मिलाकर खेत में मिला देवें तथा बुवाई करें l यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ट्राईकोडर्मा का उपयोग निर्माण तिथि से 120 दिन के भीतर कर लेना चाहिये तथा ट्राईकोडर्मा के उपचार से पहले या बाद में रसायनों से बीजोपचार नहीं करना चाहिये l
सिंचाई जल का कुशल उपयोग
क्या आप जानते हैं कि :
* भारत में विश्व की 16 प्रतिशत आबादी रहती है जबकि इसके पास विश्व की 2 प्रतिशत भूमि तथा 4 प्रतिशत पानी के स्त्रोत हैं।
* भारत में 83 प्रतिशत पानी का प्रयोग कृषि के लिए होता है।
* वर्ष में कुल 100 घंटे ही वर्षा होती है। जल संकट का समाधान भी इन्हीं 100 घंटों में होने वाली वर्षा के पानी के संचयन, कुशल प्रयोग एवं सुप्रबंधन द्वारा ही सम्भव है।
* भू-जल का स्तर आमतौर पर 20-60 से.मी. प्रति वर्ष नीचे जा रहा है लेकिन कहीं-कहीं पर तो ये दर एक मीटर प्रति वर्ष अथवा इससे भी अधिक है।
* एक किलो धान पैदा करने के लिए 2000-3000 लीटर एवं एक किलो गेंहूँ पैदा करने के लिए 800-1000 लीटर पानी खर्च होता है।
* नलकूप की होदियों की गहराई मानव जीवन के लिए तो खतरा बनती जा रही है। सबमर्सिबल पम्प लगाना इसका टिकाऊ इलाज नहीं है बल्कि इससे समस्या और बढ़ने की सम्भावना है।
* पानी के संकट को दूर करने का एक मात्र उपाय है कि इसका उपयोग घी की तरह करें और पेट्रोल की तरह इसकी उत्पादकता का आकलन करते रहें।
अतः यह सोचने का विषय है कि कहीं हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को उनके अधिकार से वंचित तो नहीं कर रहे ? समय से चेतकर पानी बचाने के उपाय करें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हम पर गर्व कर सकें।
पानी की बचत के लिए कुछ तकनीकें
- ड्रिप सिंचाई का उपयोग
ड्रिप सिंचाई प्रणाली फसल को मुख्य पंक्ति, उप पंक्ति तथा पार्श्व पंक्ति के तंत्र के उनकी लंबाईयों के अंतराल के साथ उत्सर्जन बिन्दु का उपयोग करके पानी वितरित करती है। प्रत्येक ड्रिपर/उत्सर्जक, मुहाना संयत, पानी व पोषक तत्वों तथा अन्यक वृद्धि के लिये आवश्यक पदार्थों को विधिपूर्वक नियंत्रित कर एक समान निर्धारित मात्रा में सीधे पौधे की जड़ों में आपूर्ति करता है।
ड्रिप सिंचाई की कार्यप्रणाली
पानी और पोषक तत्व उत्सर्जक से, पौधों की जड़ क्षेत्र में से चलते हुए गुरुत्वाकर्षण और केशिका के संयुक्त बलों के माध्यम से मिट्टी में जाते हैं। इस प्रकार, पौधों की नमी और पोषक तत्वों की कमी को तुरंत ही पुन: प्राप्त किया जा सकता है | यह सुनिश्चित करते हुए कि पौधे में पानी की कमी नहीं होगी, इस प्रकार गुणवत्ता, उसके इष्टतम विकास की क्षमता तथा उच्च पैदावार को बढ़ाता है।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लाभ
* पैदावार में वृद्धि
* बाढ़ सिंचाई की तुलना में 70 प्रतिशत तक पानी की बचत। अधिक भूमि को इस तरह बचाये गये पानी के साथ सिंचित किया जा सकता है।
* उर्वरक उपयोग की क्षमता 30 प्रतिशत बढ़ जाती है।
* उर्वरक, अंतर संवर्धन और श्रम का मूल्य कम हो जाता है।
* उर्वरक लघु सिंचाई प्रणाली के माध्यम से और रसायन उपचार दिया जा सकता है।
* बंजर क्षेत्र, नमकीन, रेतीली एवं पहाड़ी भूमि भी उपजाऊ खेती के अधीन लाया जा सकता है।
- फव्वारा सिंचाई का उपयोग
छिड़काव सिंचाई, पानी सिंचाई की एक विधि है, जो वर्षा के समान है। पानी पाइप तंत्र के माध्यम से आमतौर पर पम्पिंग द्वारा वितरित किया जाता है। वह फिर स्प्रे हेड के माध्यम से हवा और पूरी मिट्टी की सतह पर छिड़का जाता है जिससे भूमि पर गिरने वाला पानी छोटी बूँदों में बंट जाता है।
फव्वारा नोज़ल फव्वारे छोटे से बड़े क्षेत्रों को कुशलता से कवरेज प्रदान करते हैं तथा यह लगभग सभी सिंचाई वाली मिट्टियों के लिये अनुकूल है क्योंकि फव्वारे विस्तृत विसर्जन क्षमता में उपलब्ध हैं |
3. लेजर द्वारा भूमि समतलीकरण
भूमि समतलीकरण किसी न किसी यन्त्र के द्वारा हर किसान द्वारा किया जाता रहा है। लेकिन आम यन्त्रों में समतलीकरण की क्षमता ट्रैक्टर चालक की निपुणता पर निर्भर होती है। इसके फलस्वरूप अधिकांशतः समतलीकरण प्रभावी नहीं हो पाता है। लेजर द्वारा समतलीकरण की तकनीक एक नई तकनीक है जिसमें ट्रैक्टर चालक की भूमिका लगभग नगण्य होती है। लेजर द्वारा ही समतलीकरण की क्रिया पूर्ण होती है । लेजर समतलीकरण द्वारा पानी की उत्पादकता में काफी वृद्धि लाई जा सकती है।
- भू-जल रिचार्ज
जहाँ बूंद गिरे उसे वहीँ समेट लो की तर्ज पर एक नारा दिया गया कि “खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में”। इस नारे को साकार करने के लिए यह आवश्यक है कि वर्षा के पानी का समुचित उपयोग किया जाए।
भू-जल स्तर में गिरावट को रोकने के लिए वर्षा ऋतु में पानी को बह कर नालों में जाने की अपेक्षा भू-जल रिचार्ज के लिए प्रयोग करने पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित तीन उपाय गाँव व किसान स्तर पर किए जा सकते हैं।
(i) पुराने तालाबों की खुदाई एवं नवीनीकरण द्वारा गाँव के व्यर्थ जाने वाले पानी को संचित किया जा सकता है। ऐसी प्रकिया भू-जल स्तर को ऊपर उठाने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है।
(ii) गिरते हुए भू-जल स्तर को स्थिर करने के लिए वर्षा अथवा नहर से मिलने वाले अधिक पानी को भूमि के अन्दर भेजा जा सकता है। इसके लिए एक सस्ती एवं कम रखरखाव वाली शाफ़्ट प्रणाली लगाई जा सकती है।
(iii) छत पर जल की खेती अथवा छत के पानी का भूमि में रिचार्ज करना आवश्यक है l
- लवणीय-क्षारीय जल का प्रयोग
लवणीय अथवा क्षारीय भूजल के कृषि में उचित उपयोग द्वारा मीठे पानी की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। इसके प्रयोग द्वारा जलाक्रान्ति अथवा मृदा लवणता की समस्याओं से भी निदान मिल सकता है। परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ है कि यदि मीठे पानी की कमी हो तो उस पानी से कुछ सिंचाई करने के पश्चात् शेष सिंचाईयां लवणीय-क्षारीय जलों से करने पर लवणीय-क्षारीय जलों से सिंचाईयां न करने की अपेक्षा अधिक ऊपज ली जा सकती है। यदि अच्छा पानी न मिले तो लवणीय-क्षारीय पानी का प्रयोग करें तथा फसलानुसार पूरी सिंचाईया करें। लेकिन अत्यधिक खारे जल को सीधे सिंचाई हेतू उपयोग में नहीं लाया जा सकता है। इसके लिए मीठे एवं लवणीय-क्षारीय जलों के समुच्चय उपयोग की सिफारिशें की गई हैं।
मृदा परीक्षण का महत्त्व
प्रति इकाई क्षेत्र में फसल उत्पादन में वृद्धि तथा उत्पाद के गुणात्मक संवर्धन हेतु मृदा उर्वरता प्रबंधन करने के लिए ‘‘संतुलित पोषक तत्व प्रबन्ध” सफल उत्पादन की कुंजी है । तर्कसंगत एवं सुनियोजित मृदा परीक्षण कार्यक्रम के माध्यम से मृदा की पोषक क्षमता, प्रयुक्त पोषक तत्वों से फसलों की अनुक्रिया एवं समस्याग्रस्त भूमियों हेतु सुधारकों की आवश्यकता आसानी से ज्ञात की जा सकती है । साथ ही मृदा परीक्षण द्वारा पोषक तत्वों की कमी एवं कुछ तत्वों का एकत्रीकरण होने से मृदा उर्वरता पर प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सकता है । बोई जाने वाली फसलों के अनुरूप परीक्षण आधारित सिफारिशों के कृषकों द्वारा अनुसरण को बढ़ाते हुए प्रति इकाई उत्पादन लागत को व्यवस्थित कर कृषकों को लाभ पहुंचाया जा सकता है । मिट्टी के रासायनिक परीक्षण के लिए पहली आवश्यक बात है - खेतों से मिट्टी के सही नमूने लेना। न केवल अलग-अलग खेतों की मृदा की आपस में भिन्नता हो सकती है, बल्कि एक खेत में अलग-अलग स्थानों की मृदा में भी भिन्नता हो सकती है। परीक्षण के लिये खेत में मृदा का नमूना सही होना चाहिए। मृदा का गलत नमूना होने से परिणाम भी गलत मिलेंगे। खेत की उर्वरा शक्ति की जानकारी के लिये ध्यान योग्य बात है कि परीक्षण के लिये मिट्टी का जो नमूना लिया गया है, वह आपके खेत के हर हिस्से का प्रतिनिधित्व करता हो।
मृदा परीक्षण के उद्देश्य :
- प्रति इकाई क्षेत्र में कम लागत में कृषि उत्पादन बढ़ाना ।
- संतुलित खाद एवं उर्वरक प्रयोगों को बढ़ावा देना ।
- मृदा में मुख्य व सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्ध मात्रा के अनुसार फसल की पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सन्तुलित उर्वरक सिफारिश देना ।
- लवणीय एवं क्षारीय समस्याग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर भूमि सुधार हेतु सिफारिश कर उत्पादन बढ़ाना।
- क्षेत्रवार उर्वरता स्तर का आंकलन कर मानचित्रीकरण करना, जो कि दीर्धकालीन योजना तैयार करने में सहायक है ।
- बोई जाने वाली फसलों के चयन में सहायता करना ।
मृदा स्वास्थ्य गिरावट के प्रमुख कारण :
- रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग ।
- एक ही प्रकार के उर्वरकों का प्रयोग एवं भूमि से समस्त पोषक तत्वों का दोहन ।
- कार्बनिक खादों का अत्यन्त कम/नहीं के बराबर प्रयोग ।
- फसलों की कटाई के उपरान्त फसलों के अवशेष इत्यादि को जला देना ।
- फसल चक्र में ढैंचा/सनई की खेती एवं हरी खाद के प्रयोग पर ध्यान न देना ।
- फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश न किया जाना ।
- बायोफर्टिलाइजर के उपयोग के प्रति जागरूकता की कमी होना ।
- ‘‘इन सीटू’’ नमी संरक्षण के प्रति कृषकों के जागरूक न होने के कारण प्रत्येक खेत में
- मेड़बन्दी न होने से सतह की उपजाऊ मिट्टी बहकर दूर चली जाती है ।
मृदा जाँच की आवृति : कृषकों को अपने खेत की मृदा की जाँच खरीफ व रबी फसल की बुवाई से पूर्व करनी चाहिए । अगर यह सम्भव नहीं हो तो तीन वर्ष के अन्तराल पर जरूर करावें । अगर खेत का उत्पादन कम हो रहा है या फसल चक्र बदल रहे हैं तो इस अवस्था में मृदा परीक्षण अति आवश्यक है ।
मृदा नमूना लेने की विधि :
जिस खेत का मृदा नमूना लेना हो उसमें 10-15 स्थानों पर निशान लगा लें ।
प्रत्येक निशानदेह स्थान की ऊपरी सतह से घास-फूस, कंकड़-पत्थर आदि साफ कर लें ।
निर्धारित स्थान पर खुरपी या फावड़े से 15 सेन्टीमीटर गहरा ‘वी’ आकार का गड्ढा खोद लें।
गड्ढे की एक दीवार से खुरपी की सहायता से 2-3 सेन्टीमीटर मोटी परत निकाल लें ।
खेत के विभिन्न गड्ढ़ों से प्राप्त मिट्टी को किसी बर्तन में डालकर अच्छी तरह मिला लें अब मिट्टी का ढेर बना लें तथा उसके चार भाग कर लें । आमने सामने के दो भाग फेंक दें एवं दो भागों को फिर अच्छी तरह मिलायें, पुनः ढेर बनाकर चार भाग करके उक्त प्रक्रिया को तब तक करें जब मिट्टी आधा किलो रह जाये । अब उसे साफ सफेद कपड़े की थैली में भर दें ।
अब दो लेबिल लें । उन पर कृषक का नाम, ग्राम, ग्राम पंचायत, तहसील का नाम तथा खेत की पहचान/खसरा संव ली जाने वाली फसल का नाम आदि अवश्य लिख दें । एक लेबिल थैली के अन्दर एवं एक थैली के उपर बांध दें ताकि उसी के अनुसार उर्वरकों की संस्तुति दी जा सके ।
यदि मिट्टी गीली हो तो उसे छाया में सुखाकर थैली में भरना चाहिये ।
समस्याग्रस्त मृदा का सुधार एवं प्रबंधन
यदि भूमि लवणीय हो तो भूमि की ऊपरी सफेद परत को फावड़े या ट्रैक्टर स्क्रेपर लगाकर खुरचकर अलग कर देवें तथा उसके स्थान पर अच्छी मिट्टी डालें l जैविक खाद या गोबर का भी अधिक प्रयोग करें l
खरीफ में वर्षा आने से पूर्व खेत को समतल करें l वर्षा आने से पूर्व खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये जिससे भूमि की कड़ी परत टूट जाये l
वर्षा के जल को रोकने के लिए खेत में छोटी - छोटी क्यारियाँ बनानी चाहिये जिससे ज्यादा से ज्यादा वर्षा का जल उसमें जमा हो सके l ऐसा करने से वर्षा के जल के साथ लवण घुल कर नीचे चले जायेंगे l मिट्टी की जाँच से प्राप्त सिफारिश के अनुसार जिप्सम का गहरी जुताई के बाद प्रयोग करना चाहिये l
यदि सिंचाई की सुविधा न हो तो ढैंचा की बुवाई प्रथम वर्षा के तुरन्त बाद करें l ढैंचा का बीज एक हेक्टेयर में 60 किलो के हिसाब से काम में लेवें तथा बुवाई छिड़काव विधि से करें l बुवाई के 40-45 दिन बाद ढैंचे को मिट्टी पलटने वाला हल चला कर खेत की मिट्टी में मिला देवे l मिट्टी में मिलाने के ढाई से तीन माह तक खेत को वैसा ही खाली छोड़े जिससे ढैंचे के पौधे सड़ - गल कर अच्छी खाद में बदल जायें l यदि आवश्यक हो तो सिंचाई भी करें क्योंकि उचित नमी से पौधों के सड़ने की प्रक्रिया तेजी से होती है l
इस प्रकार की भूमि पर खेती हेतु बीज की मात्रा 15 से 20 प्रतिशत अधिक काम में लेनी चाहिये क्योंकि इनमें अंकुरण सामान्य मिट्टी की अपेक्षा काम होता है l
समस्याग्रस्त भूमि में नत्रजन व फॉस्फोरस पोषक तत्वों की पूर्ति के लिये क्रमशः अमोनियम सल्फेट एवं सिंगल सुपर फॉस्फेट उर्वरक का प्रयोग करना चाहिये l यदि सिंचाई का पानी लवणीय हो तो हल्की सिंचाई करें मगर अंतराल कम रखें l
समस्याग्रस्त भूमि में उचित फसल चक्र अपनाकर खेती से कुछ लाभ लिया जा सकता है l
उत्पादकता वृद्धि के मूल मंत्र
- अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए समय पर बुवाई करें ।
- प्रमाणित/उन्नत बीज ही बोयें, इससे उपज में वृद्धि होती है ।
- कम खर्च में निरोग व स्वस्थ फसल पाने के लिए बीजोपचार (बीज का टीकाकरण) अवश्य करें।
- पौधों की उचित संख्या व उचित दूरी से अच्छी बढ़वार व अधिक उपज पाने के लिए उचित बीज दर रखें । कतार में बुवाई करें एवं कतार से कतार की समुचित दूरी रखें ।
- वर्षा का पानी अधिक से अधिक जमीन के अन्दर संरक्षित करने के लिए जुताई व बुवाई ढ़लान के विपरीत करें ।
- कीट तथा रोग प्रकोप में कमी लाने के लिए फसलें बदल-बदल (फसल-चक्र) कर बोये ।
- मिलवां फसल (इन्टरक्रोपिंग) ले, जोखिम कम करें ।
- दलहनी तथा तिलहनी फसलों में जिप्सम का प्रयोग करें, भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उपज की गुणवत्ता बढ़ायें ।
- पानी की बचत करने एवं सिचिंत क्षेत्र बढ़ाने के लिए फव्वारा, ड्रिप व पाइप लाइन का इस्तेमाल करें ।
- फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करें, कम पानी की स्थिति में भी अच्छी पैदावार प्राप्त करें ।
- मित्र कीटों का संरक्षण करें । प्रकाशपाश व फेरोमोनट्रेप काम में लेवें । इससे रसायनों का प्रयोग कम होगा एवं बिना रसायनों के कीड़ों पर नियंत्रण किया जा सकेगा, जिससे काश्त लागत में कमी आयेगी ।
- रासायनिक उर्वरकों से होने वाले कुप्रभावों से बचने के लिए जैवित खेती अपनायें ।
- उपज का अधिक मूल्य प्राप्त करने के लिए उपज को सुखाकर तथा अच्छी तरह साफ कर बाजार में ले जायें ।
- धोखाधड़ी से बचने के लिए खाद, बीज व दवा खरीदते समय बिल अवश्य लें । इससे आदान की गुणवत्ता भी सुनिश्चित होगी ।
- कृषि कार्यक्रमों में भागीदारी बढ़ायें, नवीनतम जानकारी लें, समस्या का समाधान पायें, उन्नत तकनीकी का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ाएं ।
- फसल बीमा करवाऐं इससे जोखिम कम होता है ।
- समय, श्रम एवं पैसा बचाने के लिये उन्नत कृषि यंत्रों का प्रयोग करें ।
- उर्वरक पर पैसा बचाने के लिये मिट्टी की जांच करवा कर सिफारिश के अनुसार ही संतुलित उर्वरक काम में लें ।
- खरपतवार, रोग व कीट के प्रकोप में कमी लाने के लिये गर्मी में गहरी जुताई (भारी मिट्टियों वाले क्षेत्र में) अवश्य करें ।
